नारद ने अपने भक्ति सूत्र में भक्ति को परिभाषित करते हुए कहा है- ‘ईश्वर के प्रति प्रेम ही भक्ति है।‘ शांडिल्य ने भी इसी से मिलती जुलती परिभाषा दी है- ‘ईश्वर के प्रति प्रेम अनुराग ही भक्ति है'- ‘सा परानुरक्तिः ईश्वरे।‘1 इस प्रेमरूपा और अमृतस्वरूपा भक्ति को प्राप्त करके मनुष्य सिद्ध हो जाता है,साधक हो जाता है। ईश्वर के प्रति अनुराग की प्रगाढ़ता होने के कारण साधक लौकिक और वैदिक कर्म कांडों का त्याग कर देता है।वह अपने प्रियतम भगवान में अनन्यता और प्रतिकूल विषयों के प्रति उदासीनता हो जाता है। कबीरदास जी भी अपने आराध्य से तादात्म्य होने के लिए सभी लौकिक और वैदिक कर्मकांडो का त्याग करते हैं। वे छापा,माला,तिलक को नकारते हुए केवल और केवल नाम की महत्ता पर जोर देते हैं - ' मुआ कबीर जपत श्री रामा'।
Dr. Geeta Prajapati (Thu,) studied this question.