भारतीय इतिहास की 15 अगस्त 1947 तारीख का मतलब अबाल-वृद्ध सभी को मालूम है किंतु 24 जुलाई 1991 का एहसास अभी भी बहुत कम लोगों को है। स्वतंत्रता के 44 साल बाद नई उद्योग नीति की घोषणा हुई, जिसमें एक ऐसे अर्थतंत्र का आकार-प्रकार बनाया गया जो राजनीति को नियंत्रित करने के बजाय उससे नियंत्रित करने की इच्छा से लेंस था। 44 वर्षों के अवधि में जो राष्ट्रीय राजनीतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और सामाजिक संस्कृति की रचना हुई वह एक पल में ‘ग्लोबलाइजेशन’ अर्थात भूमंडलीकरण में तब्दील कराई गई। दूसरे शब्दों में कहे तो यही से भारत के वैश्वीकरण की शुरुआत थी। इस घटना को अनेक संज्ञाओं से जाना जाता है। जैसे कि जगतीकरण, वैश्वीकरण, भूमंडलीकरण,ग्लोबकरण, विश्वायन, पूंजीवाद,सर्वव्यापकीकरण आदि । इस घटना के पक्ष विपक्ष में राजनीतिक दल, जन पक्षियआंदोलक, पिछड़ी जातियों, महिलाओं,गरीबों और दलितों के हितचिंतक, मार्क्सवादी, आधुनिकता के आलोचक,अधिकारी, गांधीवादी और पर्यावरणवादियों ने अपनी राय बनाई। साहित्य भला इस घटना से अछूता कैसे रहेगा? साहित्यकारों ने भी इस परिघटना से प्रभावित होकर साहित्य सृजन किया है।
Dr. Alka Narayan Gadkari (Sun,) studied this question.