िततमान समय में िैश्वीकरण का बोलबाला ै । य समय तकनीक का समय \, हजसमें नए-नए प्रयोग प्रत्येक स्तर पर ो र े ैं । िैश्वीकरण के दौर में \ह िं दी कहिता ने नए अनुभिोिं, सिंिेदनाओिं और सामाहजक यथाथत को अहभव्यक्त \करने का म त्वपूणत कायत हकया ै । िैश्वीकरण ने दुहनया को एक गााँि की \तर जोड़ हदया ै, हजससे आहथतक, सािंस्कृ हतक और सामाहजक स्तर पर व्यापक \पररिततन हुए ैं । इन पररिततनोिं का प्रभाि ह िं दी कहिता पर भी स्पष्ट रूप से \हदखाई देता ै । \समकालीन ह िं दी कहियोिं ने िैश्वीकरण के कारण उत्पन्न उपभोक्तािाद, \बाजारिाद, सािंस्कृ हतक सिंकट, हिस्थापन और असमानता जैसे हिषयोिं को अपनी \कहिताओिं में प्रमुखता से उठाया ै । आज की ह िं दी कहिता के िल भािनात्मक \अहभव्यक्तक्त तक सीहमत न ीिं ै, बक्ति ि सामाहजक चेतना और प्रहतरोध \का माध्यम भी बन गई ै । कहि आम आदमी के जीिन में आए बदलािोिं, \उसकी पीड़ा, सिंघषत और आशाओिं को अपनी रचनाओिं के माध्यम से व्यक्त \करते ैं । \िैश्वीकरण के प्रभाि से भाषा और शैली में भी पररिततन देखने को हमलता \ै\। नई पीढी के कहि पारिंपररक प्रतीकोिं के साथ-साथ आधुहनक जीिन के \प\्\रतीकोिं—जैसे बाजार, मीहडया, तकनीक, इिंटरनेट और म ानगरीय जीिन को भी \अपनी कहिता का ह स्सा बना र े ैं । इससे ह िं दी कहिता का दायरा और \व\्\यापक हुआ ै । इसके साथ ी िैश्वीकरण ने सािंस्कृ हतक हिहिधता के सिंरक्षण \की चुनौती भी पैदा की ै । ह िं दी कहिता इस चुनौती का सामना करते हुए \स\्थानीयता, लोकजीिन और भारतीय सािंस्कृ हतक मूल्ोिं को भी अहभव्यक्त करती \ै\। इस प्रकार ह िं दी कहिता िैहश्वक और स्थानीय दोनोिं स्तरोिं के अनुभिोिं को \समेटने का प्रयास करती ै । िैश्वीकरण के दौर में ह िं दी कहिता ने बदलते \समय की जहटलताओिं को सिंिेदनशीलता के साथ व्यक्त हकया ै । य कहिता न के िल सामाहजक यथाथत का दपतण ै, बक्ति मानि मूल्ोिं और सािंस्कृ हतक अक्तिता को बचाने का सशक्त माध्यम भी ै ।
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डॉ. विनय कुमार
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डॉ. विनय कुमार (Thu,) studied this question.
www.synapsesocial.com/papers/69d894526c1944d70ce054da — DOI: https://doi.org/10.5281/zenodo.19451417
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