PulseExploreJournal ClubDebatesTrendingResearchersJournals
Instagram
HomeExploreJournal ClubTrending
Synapse
⌘+K
Synapse
May 7, 2026International Journal of Novel Research and Development0 citationsOpen Access

आधनक हद सहतय म बजरवद ससकत क चतरण

DDDr. Pandurang Ashok Dukale

Key Points

  • The paper examines how globalization and consumerism have transformed cultural identities and values in India since 1991.
  • Analyzed cultural trends and advertising techniques post-1991.
  • Investigated the psychological impact of consumerism on Indian identity.
  • Reviewed literature on the evolution of language and societal norms in response to market influences.
  • Identified a shift from traditional values to consumer-focused psychology in both urban and rural settings.
  • Noted significant changes in language usage reflecting global influences and commercialization.
  • Highlighted the emergence of a new culture where materialism and consumer identity overshadow traditional norms.

Abstract

१९९१ के बाद विश्व स्तर पर कई महत्वपूर्ण घटनाएँ घटित हुई। सेवियत संघ का विघटन हुआ और भारत ने उदार आर्थिक नीति का स्वीकार किया। तब से भारतीय बाजार विश्व के लिए खुले हो गए। हर कोई अपना माल बेचने के लिए तरह-तरह की कल्पनाएँ अपनाने लगा। नए तरह के विज्ञापन निर्माण कराए गए। लखपति, करोड़पति बनाने के सपने दिखाएं जाने लगे। भारतीय मनोविज्ञान का अध्ययन करके गोरा बनाने वाली क्रीम बाजार में लाई गई। महँगी गाड़ी, परफ्यूम, सौंदर्य बढ़ाने वाली साबुन यह जिसके पास है वह अमीर समझा जाने लगा। यहाँ तक की सिगारेट पीना भी अमीरी के लक्षण समझे जाने लगे। निजीकरण और भूमंडलीकरण ने उपभोक्ता संस्कृति को जन्म दिया। जिसने पुरी दुनिया को बाजार में परिवर्तित कर दिया। विज्ञापन में नवीनता लाने के लिए अंग प्रदर्शन वाले विक्षिप्त और प्रक्षोभक दृश्य दिखाए जाने लगे। कहीं डरा धमकाकर,स्वास्थ्य का हवाला देकर आरोग्य रक्षा के लिए वह उत्पादन कितने सही है यह दिखाने का प्रयास किया गया। मॉल संस्कृति का उदय हुआ जिससे सभी चीज एक जगह मिलने लगी इससे स्थानीय संस्कृति, अस्मिता और आर्थिक स्थिति में बड़ा बदलाव आया। इससे लोगों के विचारों में परिवर्तन आया साहित्य में भी परिवर्तन आया। भाषा का स्वरूप बदल गया परिणाम स्वरूप पुरानी परंपरा और संस्कृति पूरी तरह से बदल गई। जहाँ उदारीकरण, वैश्वीकरणमें‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना नजर आती थी।जिसमें प्रेम, सद्भाव और त्याग दिखाई पड़ना चाहिए था, वहाँ बाजारवाद निर्माण हुआ, जिससे उपभोक्ता निर्माण हुए। ऐसा मनोविज्ञान निर्माण हुआ जिसने जागरूक नागरिक से बाजारू नागरिक बनाएँ। जिसका केंद्रीय भाव सिर्फ नफा खोरी रहा है।बाजारवाद की इस स्थिति ने शहरों से लेकर गाँवों तक सांस्कृतिक परीदृश्यता को बदलकर मनुष्य को वैश्विक अवधारणा से लेकर एकल उपभोक्ता तक रख दिया।मनुष्य हर चीज में माल ढूँढने लगा। यहाँ तक वह खुद को एक वस्तु के रूप में बाजार में खड़ा करने लगा। उसे औरत भी माल नजर आने लगी। खेल, साहित्य, राजनीति,धार्मिकता यहाँ भी बोलियाँ लगने लगी । खेलों में आदमी को पैसों पर तोला जाने लगा। मनुष्य की कीमत लगाई जाने लगी।नैतिकता, सभ्यता, कुल मर्यादा वह भूल गए। इससे हमारी पुरानी परंपरा और अस्मिता तहस-नहस हो गई। जहाँ मीडिया खुले आम नारी के अंग प्रदर्शन को बढ़ावा दे रहा है, वहाँ साहित्य कैसे पीछे रह सकता है। जहाँ प्रेम जैसी संकल्पना बड़ी नाजुकता से प्रस्तुत की जाती थी वहाँ विकृति के साथ विषय भाव आ गया है। दया,करुणा, सहदयता आदि बंधनों से मनुष्य जैसे मुक्त हो गया। रहन-सहन के साथ-साथ पहनने ओढ़ने की चीजों में भी पुरानी और नई पीढ़ी में संघर्ष अधिक तीव्र हो गया है। भाषा का स्वरूप और शब्दों के प्रयोग में भी बड़ा बदलाव आया है। ब्रश, टूथपेस्ट, होटल, ट्रैवल, इंटरनेट, शर्ट, पैंट, टीवी, मोबाइल, टॉयलेट, बाथरूम,की बोर्ड,प्रिंट,स्टेपलर जैसे शब्दों का प्रयोग विश्व स्तर पर सभी भाषाओं में हो रहा है। ग्रामीण और शहरी संस्कृति में बड़ा बदलाव आया है। इसका प्रभाव स्पष्ट रूप से साहित्य में दिखाई पड़ता है। निदा फ़ाज़ली की राय में,“बाजार ने एक नई संस्कृति का गठन किया है कभी शब्दों की अहमियत होती थी आज शब्द हाशिए पर चले गए हैं। क्रिकेट का बल्ला राजनेता का चेहरा वह उनका भाषण संस्कृति के चेहरे बन चुके हैं।”1

Ask AI
Helpful
Bookmark
Share
View Full Paper

Cite This Study

Dr. Pandurang Ashok Dukale (2026) studied this question.

synapsesocial.com/papers/69fc2ba98b49bacb8b347a35https://doi.org/10.56975/ijnrd.v11i2.312382
Ask AI
Helpful
Bookmark
Share
View Full Paper