यह शोध-पत्र समकालीन राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में पंडित जवाहरलाल नेहरू के राजनीतिक विचारों की प्रासंगिकता का विश्लेषण करता है। नेहरू भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेता तथा स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री थे, जिनके राजनीतिक दर्शन ने आधुनिक भारत की राज्य-व्यवस्था, लोकतांत्रिक ढांचे और विदेश नीति की नींव रखी। उनके विचार लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा गुटनिरपेक्षता जैसे मूल सिद्धांतों पर आधारित थे।\वर्तमान वैश्विक एवं भारतीय राजनीतिक परिदृश्य—जहाँ एक ओर लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती और पारदर्शिता की आवश्यकता है, वहीं दूसरी ओर सांप्रदायिकता, असमानता, वैश्वीकरण और तकनीकी परिवर्तन जैसी चुनौतियाँ विद्यमान हैं—इन परिस्थितियों में नेहरू के विचारों की पुनर्व्याख्या और पुनर्मूल्यांकन अत्यंत आवश्यक हो जाता है। उनका लोकतांत्रिक समाजवाद आज सामाजिक न्याय, समावेशी विकास और कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को सुदृढ़ करने में सहायक सिद्ध होता है। धर्मनिरपेक्षता के संदर्भ में नेहरू का दृष्टिकोण राज्य और धर्म के पृथक्करण तथा सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार पर आधारित था, जो वर्तमान समय में सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता बनाए रखने के लिए प्रासंगिक है। इसी प्रकार उनकी गुटनिरपेक्ष विदेश नीति आज बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) के रूप में परिलक्षित होती है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आधुनिक संस्थानों के निर्माण पर उनका बल आज भी शिक्षा, अनुसंधान, तकनीकी विकास और नवाचार की दिशा में मार्गदर्शक सिद्ध होता है। हालांकि, आलोचनात्मक दृष्टि से यह भी देखा गया है कि उनकी नीतियों की कुछ सीमाएँ—जैसे अत्यधिक केंद्रीकरण या नियोजित अर्थव्यवस्था की चुनौतियाँ—समकालीन परिप्रेक्ष्य में नए विमर्श को जन्म देती हैं। अंततः यह शोध-पत्र इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि नेहरू के राजनीतिक विचार न केवल ऐतिहासिक महत्व रखते हैं, बल्कि वर्तमान भारतीय राजनीति और वैश्विक परिदृश्य में भी उनकी वैचारिक प्रासंगिकता बनी हुई है। उनके सिद्धांतों की समालोचनात्मक पुनर्व्याख्या समकालीन लोकतंत्र को अधिक समावेशी, प्रगतिशील और संतुलित बनाने में सहायक हो सकती है।\
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Akash Kumar
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Akash Kumar (Thu,) studied this question.
www.synapsesocial.com/papers/69d8948f6c1944d70ce0574e — DOI: https://doi.org/10.5281/zenodo.19453981